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एक साधारण नारी'

यूँ तो हम सभी एक जीवन के इर्द गिर्द घूमते हैं और सही मायने में हम ही इसके रचयिता होते हैं। वर्षों से मन में एक इच्छा थी कि ऐसे ही कुछ शख्स की कहानी को मैं बयाँ करूं जो जीवन की एक नई परिभाषा लिखते हैं। कुछ ऐसी कहानियाँ जिनको सुनकर जीवन का सच, संघर्ष और खूबसूरती सब दिखायी देने लगे।
एक छोटी सी कोशिश इसी दौर से गुज़रते उन लोगों के जज़्बातों को शब्दों की माला में पिरोकर, हकीकत से रूबरू करने का प्रयास मेरी कलम से…..
आज की कड़ी में अनिता की कहानी जो EastSons GoodWorks का हिस्सा है और हमारे सेंटर को साफ़ सुथरा रखने का कार्य करती है।

‘एक साधारण नारी’

छुट्टी का समय हो चला था, बच्चे इधर-उधर भागने लगे मानो सारा ज्ञान प्राप्त करके थक कर चूर हो गए हों, तभी राहत की सांस लेती हुई, बाहर की तेज धूप से बचती हुई अनिता क्लासरूम के ठंडे फर्श पर आ बैठी| थोड़े पैर फैलाते साड़ी को पैरो से खींचते हुए दीवार की टेक लगाकर बैठ गई| दिन भर ना जाने कितने घरों में काम करके आई होगी बेचारी भला थके भी तो क्यों न। इसी बीच कुछ बच्चे अपनी कॉपिया लेकर मेरे चारों तरफ नाचने लगे और होमवर्क के लिए एक के बाद एक कॉपिया पकड़ाने लगे| कुछ देर में फिर से सब इधर- उधर भागने लगे और मैं भी ज़रा कुछ मिनट चैन से बैठ गई।
क्लासरूम में शांति छा गई थी तभी मेरा ध्यान एक बार फिर अनिता की तरफ गया। क्या हुआ अनिता आज तुम परेशान सी लग रही हो? मैंने सहज ही पूछ लिया। उसकी तरफ से कोई उत्तर ना पाकर जब मैंने उसकी ओर देखा तो मैंने ग़ौर किया कि आज उसकी आँखे खुद में ही उससे कितने सवाल कर रही थीं…… आखिर परेशान हो भी तो क्यों ना रोज सुबह घर का काम करके निकलना, बच्चों को स्कूल भेजना फिर ना जाने कितने घरों में काम करना और शाम तक काम करके घर लौटना… पर उसकी दिनचर्या यहीं ख़त्म नहीं होती। घर जाकर घर के सदस्यों के लिए खाना बनाना, नहाना, कपड़े धोना और फिर थककर चूर हो जाना।
एक मैली सी साड़ी में लिपटी साधारण सी ‘औरत’….. औरत, माँ, पत्नी या फिर घर चलाने वाली वह औरत जो पति की लाचारी की वजह से खुद ना जाने कितने घंटो लगातार काम करती है। आज कुछ बुझी बुझी सी बैठी बतियाने लगी…… क्या अनिता कितना काम करती हो। अपने लिए भी समय निकाला करो। थोड़ा आराम किया करो। क्यों पति भी तो कमाता होगा ना? थोड़ी चुप्पी साध वह बोली… नहीं मैडम जी वह तो नकारा है। मैंने फिर आश्चर्य से पूछा.. क्या… घर तुम ही संभालती हो? वह बोली तो और कौन संभालेगा मैडम। उसकी तरफ से प्रश्न में ही उत्तर आया। क्यूँ अगर तुम दोनों मिलकर कमाओगे तो ज्यादा अच्छा होगा ना… मैंने कहा….अनिता बोली कमान तो दूर उसको दारू पीने से फुर्सत मिले तब न, उसने आगे बताया एक एक्सीडेंट में उसने अपना हाथ गवाँ दिया, लाचारी के नाम पर कुछ दोस्त ले जाते हैं उसके और दारू पीने से बाज नहीं आते।
ओह! सुनकर दुःख हुआ अनिता पर बहुत लोग ऐसे भी हैं जो इसे कमजोरी ना बनाकर बहुत काम करते हैं और अपना परिवार पालते हैं। कहीं तुम पर हाथ तो नही उठाता? ना चाहते हुए भी मैंने पूछ लिया…. मुझे शंका हुई उसके चेहरे की तिलमिलाहट देखकर। थोड़ा ठहर कर बोली- मारता क्यों नहीं मैडम ! दारू पीकर किसे होश रहता है | मौका मिलते ही गाली गलोच मार पीट करता है | मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए पूछा – तब उसकी लाचारी कहाँ जाती है? यह काम भी तो वह उसी हाथ से करता होगा ? थोड़ा व्यंग्यात्मक हँसी के साथ अनिता ने कहा – यही तो कोई नहीं समझता मैडम। लाचारी बस काम करने में है। अब तो बस अपने दोनों बच्चों के लिए कमाना हैं उनको एक अच्छा जीवन देना है | हां क्यों नहीं मैंने उसे थोड़ा बल देते हुए कहा। तुम्हारा बड़ा बेटा क्या करता है ? कुछ नहीं मैडम।19 साल का है। कहता है अब पढ़ने से शर्म लगती है, स्कूल नहीं जाऊंगा, बहुत समझाया मानता ही नहीं |
मैं अवाक रह गई। उसे देखकर लगा ही नहीं कि उसकी शादी २० साल पहले हुई होगी, अगर हुई भी तो उस समय उसकी उम्र कितनी रही होगी ? उसका चेहरा पढ़ते ये सवाल मेरे अंदर दौड़ने लगे…देखने से तो वह मानो 25 साल की लगती है। कैसा जीवन व्यतीत करना उसके कर्म में लिखा है।|
….फिर मैं खुद अपने सवालों से बाहर निकलते हुए उससे कहा ….तो क्या हुआ 19 साल का है तो। उसे कहो यहाँ पढ़ने आए। उम्र का पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं है। मैं उसे समझाउंगी..कहते हुए मैंने उसे समझाया। तभी बच्चों का शोर बढ़ता देख मैं बाहर निकल गई और आज के स्कूल का दिन खत्म करने की प्रकिया में जुट गई।
आज बस यही सोच पायी मैं एक जीवन ऐसा भी….एक साधारण स्त्री का….जिसमें मुझे उसका खुद का जीवन कहीं नज़र नहीं आया, नज़र आया तो बस खुद की खुशियों का त्याग और परिवार के लिए एक समर्पित जीवन ।

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