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खूबसूरती पर हक़ है हमारा

ये बाजारवाद का फूंका गया भ्रमित विगुल है आज कई दिनों से इस पर लिखना चाहती थी… एक और ऐड आता टीवी पर जिसमें बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए बेहतरीन कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने की हिमायत होती है…

दोनों ऐड मेरे मन में घूम ही रहा था कि मेरे पड़ोस में एक बच्ची आयी थी जो दिल्ली के बहुत जानेमाने कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती है ..मैं आँगन में बैठी उसे झूला झूलते हुए देख रही थी और उसका गाना भी सुन रही थी

…गौरतलब है कि वो पिछले साल भी जिद करके मुझसे आँगन झूला डलवाई थी ..एक पुराना से झूला पड़ा रहता है जो कभी बिट्टी के लिए आया था… ये क़रीब 7 ,8 साल की बच्ची अब उसपर अपना अधिकार समझती है।

अब मैं विषय पर आती हूँ वही आँगन में कुछ एलोवेरा के पौधे लगे हैं ,एकाएक उसकी निगाह उन पौधों पर पड़ती है झूले से उतरकर दौड़कर एलोवेरा तोड़ती है और छीलकर मुँह पर ख़ूब रगड़ रही है…

मेरे पास आकर कहती है इसे लगाने से लोग गोरे हो जाते हैं ना!
मुझे थोड़ी सी हँसी आयी मैंने कहा खाया भी जाता है खाने से दिमाग तेज होता है .! और तुम तो खुद ही गोरी हो !

बच्ची बोली नहीं मुझे पता है मम्मी ने बताया मम्मी लगाती हैं मुझे भी लगाने को कहती हैं ..मैं खाऊँगी नहीं बस लगाऊंगी ..इसे लगाने से सुंदर हो जाऊँगी ..मैंने फिर हँसकर पूछा सुंदर होने से क्या होगा? उसने कहा फिर सुंदर सा दूल्हा मिलेगा …हँसी के साथ मुझे अचरज भी हुआ …

पर अभी मत चौकिये ! आगे सुनिये !,मैं उसे कुछ समझाने के मूड में आ गयी ..मैंने कहा इसका रस पीने से याददाश्त बढ़ती है ख़ूब पढ़कर कुछ बनना है कि सिर्फ़ सुंदर बनना … ख़ूब सोचकर बताओ ! अबकी उसके जबाब पर मैं अवाक रह गयी उसने कहा ! नहीं मुझे सुंदर ही बनना है !

..,मन में कहा कि सत्यानाश हो इस बाजारवाद का ! अबोध बाल मन को भी ग्लैमर ने जकड़ रखा है …मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इसे कैसे समझाऊँ ..ख़ूब पैसा कमाने वाले बाप की बेटी है जिसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में 3 साल से भेजा जा रहा है औसत बुद्धि के माँ बाप से तो कोई आशा नहीं वो तो छोटी सी बच्ची के स्कूल के नियमों , टेस्ट एक्जाम को ऐसे बताते हैं जैसे आईएस की परीक्षा और इंटरव्यू हो … पर ये कॉन्वेंट ..??

अचरज़ तब और भी हुआ जब मेरे यहाँ खेतों में काम करने वाली काकी की नातिन जो प्राइमरी स्कूल में पढ़ती है और ज्यादातर मेरे घर में रहती है कुछ पढ़ाई लिखाई के साथ यही खेलती रहती है मैंने उससे भी पूछा तुम्हें भी कुछ बनना है या इसकी तरह सुंदर ही बनना है ..उसने ज्यादा दुनिया नहीं देखी उसकी नजर में मेरे जैसा जीवन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है उसने बहुत सोचकर कहा भाभी आप जैसा बनना है ..

मैंने समझाया .. कि मुझे छोड़ो ….देखो लड़कियां डॉक्टर इंजीनियर पुलिस टीचर बन रही हैं तब उसने लड़कियों का सबसे चहेता प्रोफेशन डॉक्टर कहा ..मुझे डर लगा कहीं ये भोजपुरी हीरोइन बनने की बात न कह दे क्योंकि कभी खुश होकर बाप के फोन में सुने वही गाने गाती है ।

लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि एक ही उम्र की दो बच्चियां जिसमें एक हाईप्रोफाइल जीवन जी रही है दूसरी गरीब है परिवार दूसरों के यहाँ मजदूरी करता है …पर दोनों में तो ज्यादा अंतर नहीं है बल्कि गरीब बच्ची ही बेहतर सोच रखती है

आखिर ये जहर कहाँ से घुल रहा है बच्चियों में क्या सिर्फ सुंदरता पर हक है हमारा…. कहने वाली दीपिका पादुकोण का आतमुग्धता से भरे दर्शन से महिला सशक्तिकरण आएगा …क्यों नहीं हम बच्चियों को इस जहर से बचाते ….छोटी सी उम्र में सजने लगती हैं हम देखकर मुस्कुराते हैं उसे पक्का हो जाता है कि सुंदर दिखना ही जिंदगी की सबसे बड़ी प्राथमिकता है …और वो बचपन से शुरू हुआ खेल जीवन भर चलता है …

आप कहेंगे पहले भी महिलायें सजती थी ..सजती थी पर इतना समय और पैसा ,ऊर्जा नहीं बर्बाद करती थी …

मैं एक शादी में गयी थी एक दशवीं में पढ़ने वाली लड़की करीब चार घंटे मेरे सामने ही सजती रही …सज सज कर कार्टून बन गयी माँ आकर कह रही हैं नजर न लग जाये मेरी बेटी को …मुझे भी थोड़ी तारीफ करनी पड़ी …लडक़ी बोली दी ! मेरे पास मेकअप का पूरा समान नहीं है नहीं तो आप देखती …मन में आया कि सही में झोले भर से क्या होता है …बोरा भर मैकअप का सामान तो होना ही चाहिए।

आखिर हम जा कहाँ रहे हैं … हम स्त्री स्वतंत्रता की बात किस मुँह से करते हैं इसतरह तो एक मानसिक गुलामी में जकड़ी जा रही हैं … बहुत पहले टीवी पर सबना आज़मी की अर्थ फ़िल्म देखी थी तो समझ में आया कि जीवन की सार्थकता सिर्फ पत्नी और प्रेयसी बनने में नहीं है , ध्यान से अपने आसपास देखे तो जीने के कई विजन हैं बस उसके लिए हिम्मत और लगन चाहिए ।

मैंने बहुत पहले नेल्सन मंडेला की आत्मकथा पढ़ी थी जिसमें उन्होंने बताया कि ! अगर हम पूर्वाग्रहों और संक्रिर्ण सोच के सीखचों के पीछे बंदी हैं तो सच्चे अर्थों में कभी भी आजाद नहीं है।

बच्चियों को बताया जाये कि मॉडल और एक्ट्रेसेस की नकल जीवन नहीं है उनका ग्लैमर उनकी जीविका है । सुंदर दिखना और किसी पुरुष को रिझाना में ही जीवन की सार्थकता नहीं है । उनके सामने हमेशा कल्पना चावला और इंदिरा गांधी ,सरोजनी नायडू आदि को आदर्श रखा जाये न कि प्रियंका चोपड़ा सोनम कपूर या करीना को ।

याद रखिये हम सदियों शोषित और वंचित रहे हैं उसका कारण था हमारी पराधीनता और कोमलता ,क्यों हम अपनी बच्चियों को भी इसी नर्क में घसीट रहे हैं …सुंदर दिखना गलती नहीं है गलती है उसके लिए जीवन के अमूल्य पलों और अपनी ढ़ेर सारी ऊर्जा को बस उसी में झोंक देना…

ख़ूब सजो सँवरो पर ध्यान रखो कि उसके पीछे जीवन का स्वर्णिम पल और सुनहरा भविष्य छूट न जाये । और वो मनोरोग न बनने पाये ।

Rupam Mishra

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