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शिक्षा की अलख : माँ और बेटे का संवाद

कैसी मिठाई कैसा पकवान, हूँ मैं कबसे हैरान

मुझको तो रोटी दे दे, हूँ बहुत देर से भूखा माँ

और ये छुटकी तो दिन भर सोई नहीं है

दूध पीना है शायद इसको, इसलिए कब से रो ही रही है

दादी तो खटिया पे बैठी खाँस रही है

जब से गई हो, तब से तुम्हारी राह ताक रही है

नहीं लाई क्या उनकी दवा आज भी ? जाने दे माँ, कल ला देना

दादी तो भोली है, पिघला कर दे देना गुड़ की भेली आज भी

अरे सुन तो माँ, रत्ना काकी आयीं थीं, जो तुमने पिछले महीने दाल दिए थे न उनको

वही उधार चुकता करने, एक कटोरी दाल लाईं थीं

आटा तो लाई हो न माँ ? मैंने लकड़ी जला दी है

अब जल्दी से रोटी बना दे, दादी को भी तेरे आने की आवाज़ लगा दी है

बहुत थक गई हो क्या माँ? काश कि मैं कमा कर लाता

तो तुझको न काम पर जाना पड़ता, तुझको भी थोड़ा आराम मिल जाता

सुन मेरे मुन्ने बात ध्यान से, अभी पढ़ ले जी जान से

शिक्षा को जब अपनाएगा, सारे सपने पूरे कर पाएगा

दूध, दवा और मिठाई पकवान तो, यूँ चुटकियों में ले आएगा

जो तू अगर पैसों के चक्कर में फँस जाएगा

अपना आज तो क्या, भविष्य भी गँवाएगा

वाकई फिक्र करता है माँ की, तो अलख जगा ले शिक्षा की

इसको अपना धर्म बना ले , इसी को अपना कर्म बना ले

जो तू पढ़ लिख जाएगा, सम्मानित जीवन जी पाएगा

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