प्रियांशु

वैसे तो EastSons GoodWorks आने वाले हर बच्चे को यहां से बेहद लगाव है लेकिन इन सबके बीच एक बच्चा ऐसा भी है जिसे गुड वर्क्स से इश्क है। वह है प्रियांशु।
प्रियांशु गुड वर्क्स से तब से जुड़ा है जब गुड वर्क्स ने अपनी नींव रखी थी और अपना अस्तित्व तलाश रहा था। शायद यही कारण है कि वह संस्था की हर छोटी बड़ी चीजों में बढ़ चढ़कर हिस्सा लेता है और सभी बातों का बहुत खयाल रखता है। हंसमुख, शांत और शर्मीले स्वभाव का प्रियांशु सभी बच्चों का चहेता भइया है। वह अपनी ज़िम्मेदारियाँ बख़ूबी निभाता है। ख़ुद बच्चा होते हुए भी सभी बच्चों का अभिभावक है।
प्रियांशु एक बहुत ही हिम्मती और आशावादी लड़का है। एक दुर्घटना में अपने पैर की अंगुली गंवा देने के बावजूद उसने हिम्मत नहीं हारी और एक प्रेरणास्रोत बनते हुए अपने सपनों को पंख देने के लिए फिर से डटकर खड़ा हो गया। प्रियांशु को डांस का जुनून है। गुड वर्क्स का यह माइकल जैक्सन बड़ा होकर एक बड़ा डांसर बनने का सपना रखता है।

ईश्वर तुम्हारा सपना पूरा करें….

आवेश

आप जिस बच्चे को देख रहे हैं उसका नाम …आवेश हैं। आवेश चार साल का एक नटखट, चंचल, चुलबुला, समझदार, और होशियार बच्चा है।
हर माँ बाप की तरह आवेश के माँ बाप ने भी उसे लेकर बड़े बड़े सपने सजाएं हैं। इन्हीं सपनों को अंजाम देने की इच्छा से एकदिन उसकी माँ उसे लेकर हमारे पास आयीं।
आवेश के मम्मी पापा पेशे से माली हैं। पढ़े लिखे नहीं हैं लेकिन शिक्षा के महत्व को बखूबी जानते हैं। शायद इसीलिए अनेक कठिनाइयों के बावजूद उसे पढ़ाने का सोचा।
वह दिन आज भी अच्छी तरह से याद हैं मुझे जब पहली बार आवेश अपनी माँ के साथ गुड वर्क्स आया था। उस दिन उसकी माँ ने बड़ी उम्मीद से हमसे कहा….. मैम इसका ध्यान दीजिएगा। इसे खूब पढ़ाइए और अगर ना पढ़े तो डांट लगाइएगा। इसे बड़ा आदमी बना दीजिए। ये महज शब्द नहीं थे। ना उनके लिए और ना ही हमारे लिए।
आवेश हैं तो बच्चा लेकिन पूरे आत्मविश्वास के साथ हर कार्य करने की कोशिश करता है। आज उसमें काफी बदलाव देखा जा सकता है। एक दिन की ही बात है आवेश ने और बच्चों को जब “गुडआफ्टरनून मैम” बोलते हुए सुना तो खुद उसे बोलने की कोशिश करने लगा। अगले दिन जब वह आया तो “गूनानंनून मैम” बोला। सच बताऊं तो मुझे उन बच्चों के “गुड आफ्टरनून” से उतनी खुशी नहीं मिली जितनी आवेश के “गूनानंनून मैम” में मिली। जब कभी उसे प्रोत्साहित करने के लिए हम गिफ्ट या कुछ देते हैं तो वह बहुत खुश हो जाता और उस दिन उसकी खुशी उसके चेहरे पर छुट्टी होने पर दिखती है। जब वह बहुत प्यार से हँसते हुए हाथ हिलाते हुए बोलता है….बॉय मैम तो बस यही लगता है काश इस मुस्कान को कभी किसी की नज़र ना लगे।
अगर इसी तरह गरीब परिवारों के अन्य लोग भी शिक्षा के प्रति सजग हों तो न केवल उनके जीवनचर्या में बदलाव देखने को मिलेगा बल्कि वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हमारे यह आवेश देश विदेश में अपना परचम लहराएं। यह सुनने में भी कभी आश्चर्य नहीं होगा कि एक माली का बेटा अपनी कड़ी मेहनत की बदौलत ग़रीबी जैसे अभिशाप को मात देकर IAS और PCS बन गया।

एक साधारण नारी’

यूँ तो हम सभी एक जीवन के इर्द गिर्द घूमते हैं और सही मायने में हम ही इसके रचयिता होते हैं। वर्षों से मन में एक इच्छा थी कि ऐसे ही कुछ शख्स की कहानी को मैं बयाँ करूं जो जीवन की एक नई परिभाषा लिखते हैं। कुछ ऐसी कहानियाँ जिनको सुनकर जीवन का सच, संघर्ष और खूबसूरती सब दिखायी देने लगे।
एक छोटी सी कोशिश इसी दौर से गुज़रते उन लोगों के जज़्बातों को शब्दों की माला में पिरोकर, हकीकत से रूबरू करने का प्रयास मेरी कलम से…..
आज की कड़ी में अनिता की कहानी जो EastSons GoodWorks का हिस्सा है और हमारे सेंटर को साफ़ सुथरा रखने का कार्य करती है।

‘एक साधारण नारी’

छुट्टी का समय हो चला था, बच्चे इधर-उधर भागने लगे मानो सारा ज्ञान प्राप्त करके थक कर चूर हो गए हों, तभी राहत की सांस लेती हुई, बाहर की तेज धूप से बचती हुई अनिता क्लासरूम के ठंडे फर्श पर आ बैठी| थोड़े पैर फैलाते साड़ी को पैरो से खींचते हुए दीवार की टेक लगाकर बैठ गई| दिन भर ना जाने कितने घरों में काम करके आई होगी बेचारी भला थके भी तो क्यों न। इसी बीच कुछ बच्चे अपनी कॉपिया लेकर मेरे चारों तरफ नाचने लगे और होमवर्क के लिए एक के बाद एक कॉपिया पकड़ाने लगे| कुछ देर में फिर से सब इधर- उधर भागने लगे और मैं भी ज़रा कुछ मिनट चैन से बैठ गई।
क्लासरूम में शांति छा गई थी तभी मेरा ध्यान एक बार फिर अनिता की तरफ गया। क्या हुआ अनिता आज तुम परेशान सी लग रही हो? मैंने सहज ही पूछ लिया। उसकी तरफ से कोई उत्तर ना पाकर जब मैंने उसकी ओर देखा तो मैंने ग़ौर किया कि आज उसकी आँखे खुद में ही उससे कितने सवाल कर रही थीं…… आखिर परेशान हो भी तो क्यों ना रोज सुबह घर का काम करके निकलना, बच्चों को स्कूल भेजना फिर ना जाने कितने घरों में काम करना और शाम तक काम करके घर लौटना… पर उसकी दिनचर्या यहीं ख़त्म नहीं होती। घर जाकर घर के सदस्यों के लिए खाना बनाना, नहाना, कपड़े धोना और फिर थककर चूर हो जाना।
एक मैली सी साड़ी में लिपटी साधारण सी ‘औरत’….. औरत, माँ, पत्नी या फिर घर चलाने वाली वह औरत जो पति की लाचारी की वजह से खुद ना जाने कितने घंटो लगातार काम करती है। आज कुछ बुझी बुझी सी बैठी बतियाने लगी…… क्या अनिता कितना काम करती हो। अपने लिए भी समय निकाला करो। थोड़ा आराम किया करो। क्यों पति भी तो कमाता होगा ना? थोड़ी चुप्पी साध वह बोली… नहीं मैडम जी वह तो नकारा है। मैंने फिर आश्चर्य से पूछा.. क्या… घर तुम ही संभालती हो? वह बोली तो और कौन संभालेगा मैडम। उसकी तरफ से प्रश्न में ही उत्तर आया। क्यूँ अगर तुम दोनों मिलकर कमाओगे तो ज्यादा अच्छा होगा ना… मैंने कहा….अनिता बोली कमान तो दूर उसको दारू पीने से फुर्सत मिले तब न, उसने आगे बताया एक एक्सीडेंट में उसने अपना हाथ गवाँ दिया, लाचारी के नाम पर कुछ दोस्त ले जाते हैं उसके और दारू पीने से बाज नहीं आते।
ओह! सुनकर दुःख हुआ अनिता पर बहुत लोग ऐसे भी हैं जो इसे कमजोरी ना बनाकर बहुत काम करते हैं और अपना परिवार पालते हैं। कहीं तुम पर हाथ तो नही उठाता? ना चाहते हुए भी मैंने पूछ लिया…. मुझे शंका हुई उसके चेहरे की तिलमिलाहट देखकर। थोड़ा ठहर कर बोली- मारता क्यों नहीं मैडम ! दारू पीकर किसे होश रहता है | मौका मिलते ही गाली गलोच मार पीट करता है | मैंने उसे बीच में ही टोकते हुए पूछा – तब उसकी लाचारी कहाँ जाती है? यह काम भी तो वह उसी हाथ से करता होगा ? थोड़ा व्यंग्यात्मक हँसी के साथ अनिता ने कहा – यही तो कोई नहीं समझता मैडम। लाचारी बस काम करने में है। अब तो बस अपने दोनों बच्चों के लिए कमाना हैं उनको एक अच्छा जीवन देना है | हां क्यों नहीं मैंने उसे थोड़ा बल देते हुए कहा। तुम्हारा बड़ा बेटा क्या करता है ? कुछ नहीं मैडम।19 साल का है। कहता है अब पढ़ने से शर्म लगती है, स्कूल नहीं जाऊंगा, बहुत समझाया मानता ही नहीं |
मैं अवाक रह गई। उसे देखकर लगा ही नहीं कि उसकी शादी २० साल पहले हुई होगी, अगर हुई भी तो उस समय उसकी उम्र कितनी रही होगी ? उसका चेहरा पढ़ते ये सवाल मेरे अंदर दौड़ने लगे…देखने से तो वह मानो 25 साल की लगती है। कैसा जीवन व्यतीत करना उसके कर्म में लिखा है।|
….फिर मैं खुद अपने सवालों से बाहर निकलते हुए उससे कहा ….तो क्या हुआ 19 साल का है तो। उसे कहो यहाँ पढ़ने आए। उम्र का पढ़ाई से कोई लेना देना नहीं है। मैं उसे समझाउंगी..कहते हुए मैंने उसे समझाया। तभी बच्चों का शोर बढ़ता देख मैं बाहर निकल गई और आज के स्कूल का दिन खत्म करने की प्रकिया में जुट गई।
आज बस यही सोच पायी मैं एक जीवन ऐसा भी….एक साधारण स्त्री का….जिसमें मुझे उसका खुद का जीवन कहीं नज़र नहीं आया, नज़र आया तो बस खुद की खुशियों का त्याग और परिवार के लिए एक समर्पित जीवन ।

सबसे मीठी मिठाई

मुझे लिखना नहीं आता। मैं अपनी भावनाओं को कलमबद्ध नहीं कर पाती या यूं कहूँ तो मैं इसके लिए समय ही नहीं निकाल पाती। लेकिन पिछले दिनों दिवाली पर मिले एक छोटे से पैकेट ने मुझे स्नेह से इतना भर दिया कि मैं उसकी मिठास आप तक पहुंचाने के लिए बाध्य हो गई।
दिवाली के बाद अपने बच्चों से मिलने जब मैं गुडवर्क्स पहुंची तो बच्चों ने बड़े उत्साह से ऊंची ध्वनि में मुझे दीपावली की शुभकामनाएं दी। मैंने भी उन्हें गले लगाकर हमेशा ख़ुश रहने को कहा। बच्चे पूरी मस्ती में थे। उन्हें हंसता खेलता देख मैं मंत्रमुग्ध हुए जा रही थी। इसी बीच एक छोटी बच्ची मेरे पास आयी और धीमी आवाज़ में ‘हैप्पी दिवाली’ कहते हुए एक डब्बा मेरे सामने रख दिया। यह रागिनी थी। मैं अवाक रह गयी। रागिनी बेहद गरीब परिवार से है। मैंने पूछा यह क्या है ? उसने बोला, यह आपके लिए है मैम….सोहनपापड़ी की मिठाई। यह सुनते ही मैं क्रोधित हो गई। बिना कुछ सोचे उसे डांटने लगी। क्या जरूरत थी? फिजूल में पैसे खर्च कर दी। अपने लिए कुछ ले लेती। कहां से लायी इतने पैसे?
वह चुपचाप मुझे सुनती रही, फिर धीरे से बोली…ले लो मैम, बहुत मन से लायी हूँ। आप हमारे लिए कितना कुछ करती हो, क्या हम आपको एक मिठाई भी नहीं दे सकते? यह सुनते ही मेरी आँखें डबडबा गईं। उसने आगे बताया मैम पिछले कई महीनों से मैं इसके लिए पैसे इकठ्ठे कर रही थी।
मैं निःशब्द हो गयी। उस क्षण, उस भावना को व्यक्त करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं है। यकीन मानिए यह मेरे जीवन की सबसे मीठी मिठाई थी जिसका स्वाद मैंने बिना चखे ले लिया था। मन से एक आवाज़ आयी….तुम्हारी हर दिवाली हमेशा जगमगाती और मीठी रहे मेरी बच्ची…..

Slow Progress is better than No Progress

The environment in which these underprivileged children live, doesn’t teach them the importance of education. They have no clue, what education could fetch them. What do they only dream of is eating good , wearing stylish clothes, wandering on roads, flaunting highlighted hair with spikes. This is all they aspire to achieve, simply because this is only they get to see and hear.
Well, when they come to us on seeing other children, in the lure of stationery, toffees etc, after being convinced by us and might be because of several other reasons, don’t you think, coming to learn itself is the first step towards their development?
These children are of course different from other children not because they don’t have intelligence but because they haven’t got exposure, they started learning quite late and being introvert is quite obvious.
Expecting them to be civilized and well mannered all at once is not justifiable. Because of the lack of exposure their grasping power is weak hence they take longer time to learn anything, but they do.
So what, if they take more than required time to understand anything.
So what, if they forget anything taught very easily.
So what, if they make a lot of noise.
So what, if they are mischievous.
So what, if they fight with one another.
So what , if they are not aware of etiquette.
So what, if they are showing very slow progress.
Afterall, Slow progress is better than No Progress.

A Wonderful Experience at an NGO that left me motivated

I visited an NGO  EastSons’  GoodWorks Trust on 15th of August for an event organised by them. Basically, the NGO is helping to provide a better platform to underprivileged children by providing them free education. Generally in our country plenty number of NGOs are working in this field. As I explored and have seen that they are working on goodwill for slum areas children and some of them are doing in a better way.

Children whom I met today were very eager for their better future and were trying to become a known face of a new developed India & that is really appreciable. If we talk about our growth and development and go through all the sections, where these organisation are working, we would find that we are not scanting by our resources; So ostensibly we should take a step in this direction so that we can make a strong nation while making them strong. As we all know very well that education is the most important aspect for everything, From where we commence and I have analysed that the children of this NGO are doing very well. They gave wonderful performances on the Independence day. They themselves choreographed their dances and that was really outstanding and applaudable. All performed with a swagger attitude and with a blithe smile to do something better in an eclectic way. The energy was really a paradigm for those people who do the things having all the facilities, Personally, I am feeling very motivated after meeting them. Their drudgery and dedication is really inspiring for everyone. As we say “Bache bhagwan ka dusra roop hote hain” this is really veracity. All members working for these children are genuinely very caring and supportive in each term. They take care of each child and provide them the best possible facilities so that they can achieve what they want to become. Being a part of the event, I am feeling very honored and hallowed to meet all the members of the organisation and all children.

Aditi Baranwal

We all grew up

From writing with a pencil to tapping a phone, we all grew up.
From eating in our friends’ lunch boxes to waiting for weekends to have a meal with whole family together, we all grew up.
From fighting with our friends over every petty issue to looking for one another’s messages on special occasions, we all grew up.
From engraving our creativities on wall to searching for a pen at times, we all grew up.
From oiling our hair daily to rarely applying oil once or twice a month, we all grew up.
From storing our treasures in School Bags to keeping a few pieces of papers in our wallets, we all grew up.
From whole heartedly making Greeting Cards for our loving ones to sharing messages on e- platform, we all grew up.
From eagerly waiting for our Birthdays to hiding it from others, we all grew up.
From rising early in the morning for mugging up our lessons to late night reading, we all grew up.
From always being ready to fight in favour of everyone right to being a mute spectator even on witnessing anything unfair, we all grew up.
Time can snatch our childhood but not the child within us, so, let’s live our golden life again, by helping these children do the things which we miss doing now.

खूबसूरती पर हक़ है हमारा

ये बाजारवाद का फूंका गया भ्रमित विगुल है आज कई दिनों से इस पर लिखना चाहती थी… एक और ऐड आता टीवी पर जिसमें बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए बेहतरीन कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने की हिमायत होती है…

दोनों ऐड मेरे मन में घूम ही रहा था कि मेरे पड़ोस में एक बच्ची आयी थी जो दिल्ली के बहुत जानेमाने कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती है ..मैं आँगन में बैठी उसे झूला झूलते हुए देख रही थी और उसका गाना भी सुन रही थी

…गौरतलब है कि वो पिछले साल भी जिद करके मुझसे आँगन झूला डलवाई थी ..एक पुराना से झूला पड़ा रहता है जो कभी बिट्टी के लिए आया था… ये क़रीब 7 ,8 साल की बच्ची अब उसपर अपना अधिकार समझती है।

अब मैं विषय पर आती हूँ वही आँगन में कुछ एलोवेरा के पौधे लगे हैं ,एकाएक उसकी निगाह उन पौधों पर पड़ती है झूले से उतरकर दौड़कर एलोवेरा तोड़ती है और छीलकर मुँह पर ख़ूब रगड़ रही है…

मेरे पास आकर कहती है इसे लगाने से लोग गोरे हो जाते हैं ना!
मुझे थोड़ी सी हँसी आयी मैंने कहा खाया भी जाता है खाने से दिमाग तेज होता है .! और तुम तो खुद ही गोरी हो !

बच्ची बोली नहीं मुझे पता है मम्मी ने बताया मम्मी लगाती हैं मुझे भी लगाने को कहती हैं ..मैं खाऊँगी नहीं बस लगाऊंगी ..इसे लगाने से सुंदर हो जाऊँगी ..मैंने फिर हँसकर पूछा सुंदर होने से क्या होगा? उसने कहा फिर सुंदर सा दूल्हा मिलेगा …हँसी के साथ मुझे अचरज भी हुआ …

पर अभी मत चौकिये ! आगे सुनिये !,मैं उसे कुछ समझाने के मूड में आ गयी ..मैंने कहा इसका रस पीने से याददाश्त बढ़ती है ख़ूब पढ़कर कुछ बनना है कि सिर्फ़ सुंदर बनना … ख़ूब सोचकर बताओ ! अबकी उसके जबाब पर मैं अवाक रह गयी उसने कहा ! नहीं मुझे सुंदर ही बनना है !

..,मन में कहा कि सत्यानाश हो इस बाजारवाद का ! अबोध बाल मन को भी ग्लैमर ने जकड़ रखा है …मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इसे कैसे समझाऊँ ..ख़ूब पैसा कमाने वाले बाप की बेटी है जिसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में 3 साल से भेजा जा रहा है औसत बुद्धि के माँ बाप से तो कोई आशा नहीं वो तो छोटी सी बच्ची के स्कूल के नियमों , टेस्ट एक्जाम को ऐसे बताते हैं जैसे आईएस की परीक्षा और इंटरव्यू हो … पर ये कॉन्वेंट ..??

अचरज़ तब और भी हुआ जब मेरे यहाँ खेतों में काम करने वाली काकी की नातिन जो प्राइमरी स्कूल में पढ़ती है और ज्यादातर मेरे घर में रहती है कुछ पढ़ाई लिखाई के साथ यही खेलती रहती है मैंने उससे भी पूछा तुम्हें भी कुछ बनना है या इसकी तरह सुंदर ही बनना है ..उसने ज्यादा दुनिया नहीं देखी उसकी नजर में मेरे जैसा जीवन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है उसने बहुत सोचकर कहा भाभी आप जैसा बनना है ..

मैंने समझाया .. कि मुझे छोड़ो ….देखो लड़कियां डॉक्टर इंजीनियर पुलिस टीचर बन रही हैं तब उसने लड़कियों का सबसे चहेता प्रोफेशन डॉक्टर कहा ..मुझे डर लगा कहीं ये भोजपुरी हीरोइन बनने की बात न कह दे क्योंकि कभी खुश होकर बाप के फोन में सुने वही गाने गाती है ।

लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि एक ही उम्र की दो बच्चियां जिसमें एक हाईप्रोफाइल जीवन जी रही है दूसरी गरीब है परिवार दूसरों के यहाँ मजदूरी करता है …पर दोनों में तो ज्यादा अंतर नहीं है बल्कि गरीब बच्ची ही बेहतर सोच रखती है

आखिर ये जहर कहाँ से घुल रहा है बच्चियों में क्या सिर्फ सुंदरता पर हक है हमारा…. कहने वाली दीपिका पादुकोण का आतमुग्धता से भरे दर्शन से महिला सशक्तिकरण आएगा …क्यों नहीं हम बच्चियों को इस जहर से बचाते ….छोटी सी उम्र में सजने लगती हैं हम देखकर मुस्कुराते हैं उसे पक्का हो जाता है कि सुंदर दिखना ही जिंदगी की सबसे बड़ी प्राथमिकता है …और वो बचपन से शुरू हुआ खेल जीवन भर चलता है …

आप कहेंगे पहले भी महिलायें सजती थी ..सजती थी पर इतना समय और पैसा ,ऊर्जा नहीं बर्बाद करती थी …

मैं एक शादी में गयी थी एक दशवीं में पढ़ने वाली लड़की करीब चार घंटे मेरे सामने ही सजती रही …सज सज कर कार्टून बन गयी माँ आकर कह रही हैं नजर न लग जाये मेरी बेटी को …मुझे भी थोड़ी तारीफ करनी पड़ी …लडक़ी बोली दी ! मेरे पास मेकअप का पूरा समान नहीं है नहीं तो आप देखती …मन में आया कि सही में झोले भर से क्या होता है …बोरा भर मैकअप का सामान तो होना ही चाहिए।

आखिर हम जा कहाँ रहे हैं … हम स्त्री स्वतंत्रता की बात किस मुँह से करते हैं इसतरह तो एक मानसिक गुलामी में जकड़ी जा रही हैं … बहुत पहले टीवी पर सबना आज़मी की अर्थ फ़िल्म देखी थी तो समझ में आया कि जीवन की सार्थकता सिर्फ पत्नी और प्रेयसी बनने में नहीं है , ध्यान से अपने आसपास देखे तो जीने के कई विजन हैं बस उसके लिए हिम्मत और लगन चाहिए ।

मैंने बहुत पहले नेल्सन मंडेला की आत्मकथा पढ़ी थी जिसमें उन्होंने बताया कि ! अगर हम पूर्वाग्रहों और संक्रिर्ण सोच के सीखचों के पीछे बंदी हैं तो सच्चे अर्थों में कभी भी आजाद नहीं है।

बच्चियों को बताया जाये कि मॉडल और एक्ट्रेसेस की नकल जीवन नहीं है उनका ग्लैमर उनकी जीविका है । सुंदर दिखना और किसी पुरुष को रिझाना में ही जीवन की सार्थकता नहीं है । उनके सामने हमेशा कल्पना चावला और इंदिरा गांधी ,सरोजनी नायडू आदि को आदर्श रखा जाये न कि प्रियंका चोपड़ा सोनम कपूर या करीना को ।

याद रखिये हम सदियों शोषित और वंचित रहे हैं उसका कारण था हमारी पराधीनता और कोमलता ,क्यों हम अपनी बच्चियों को भी इसी नर्क में घसीट रहे हैं …सुंदर दिखना गलती नहीं है गलती है उसके लिए जीवन के अमूल्य पलों और अपनी ढ़ेर सारी ऊर्जा को बस उसी में झोंक देना…

ख़ूब सजो सँवरो पर ध्यान रखो कि उसके पीछे जीवन का स्वर्णिम पल और सुनहरा भविष्य छूट न जाये । और वो मनोरोग न बनने पाये ।

Rupam Mishra

GIVE YOUR SHARE TO SHOW YOU CARE

To work for Society is not an individual’s responsibility.
Rather, it’s collective.
Thinking of doing something for needy is good
And putting that thought into action is even better.
It’s great that you are loving & caring.
But of what use, if you don’t express your love & care.
There are many, who are desperately seeking your affection.
So, please come ahead & give your share to show you care.

जरूरतों का बोझ

मैले कुचैले धोती कुर्ते में एक बूढ़ा आदमी लकड़ियों और आटे दाल से लदी साइकिल को ले के सड़क के बीचों बीच खड़ा हो गया I वक्त था शाम का, सभी का अपने काम से लौटने का वक्त . उस बुजुर्ग का अचानक से बीच राह खड़े हो जाना आने जाने वाले राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था I पर विडंबना यह है कि उस आकर्षण का कारण बुजुर्ग का उपहास का केंद्र बनना था ना कि बुजुर्ग के प्रति मानवीय संवेदना का होना I घोर आश्चर्य का विषय है कि कैसे लोगों को उस उपहासात्मक कृत्य के पीछे की वजह नहीं दिखी , किसी को उस बुजुर्ग की अवस्था नहीं नजर आई, किसी ने ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि क्या उम्र के उस पड़ाव तक पहुँचने पर खुद उनमे इतनी ताकत होगी कि वो अपने परिवार की जरूरतों का बोझ उठा सकें , क्या किसी को उस इंसान के आत्म सम्मान को ठेस पहुँचाते हुए थोड़ी भी शर्म नहीं आई , क्या पसीने से तर बतर उस बुजुर्ग का चेहरा कोई ना पढ़ पाया जिससे यह साफ़ झलक रहा था कि वह थक के चूर हो चुका है , उसमें साइकिल को आगे खींचने की बिल्कुल भी ताकत नहीं बची है I

चिंतन का विषय यह है कि आखिर हम किस आधुनिकता की होड़ में लगे हुए हैं , आने वाली पीढ़ी को हम क्या शिक्षा दे रहे हैं, क्या मानवीय गुणों की बलि चढ़ा कर ही हम आधुनिक बन पाएंगे I क्या हम अपने अंदर दया भावना को जागृत रखते हुए आगे नहीं बढ़ सकते , क्या हमारे शिक्षित होने का पैमाना हमारा व्यवहार नहीं .
जरुरत है इस बारे में पहल करने की. खुद के सामने या खुद के संज्ञान में घटित होने वाले किसी भी अनुचित घटना के प्रति मूकदर्शक बने रहना मनुष्य होने का सूचक नहीं I यदि हम अपनी संवेदनाओं को जीवित रखने के इस विचार को अपना लें तो निश्चय ही हमारी आने वाली पीढ़ी अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बनाएगी क्योंकि बच्चे वो नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं , बच्चे तो वो सीखते हैं जो वो हमें करता हुआ देखते हैं I