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We all grew up

We all grew up

[vc_row 0=””][vc_column width=”2/3″][vc_column_text 0=””]From writing with a pencil to tapping a phone, we all grew up.
From eating in our friends’ lunch boxes to waiting for weekends to have a meal with whole family together, we all grew up.
From fighting with our friends over every petty issue to looking for one another’s messages on special occasions, we all grew up.
From engraving our creativities on wall to searching for a pen at times, we all grew up.
From oiling our hair daily to rarely applying oil once or twice a month, we all grew up.
From storing our treasures in School Bags to keeping a few pieces of papers in our wallets, we all grew up.
From whole heartedly making Greeting Cards for our loving ones to sharing messages on e- platform, we all grew up.
From eagerly waiting for our Birthdays to hiding it from others, we all grew up.
From rising early in the morning for mugging up our lessons to late night reading, we all grew up.
From always being ready to fight in favour of everyone right to being a mute spectator even on witnessing anything unfair, we all grew up.
Time can snatch our childhood but not the child within us, so, let’s live our golden life again, by helping these children do the things which we miss doing now.

[/vc_column_text][/vc_column][vc_column width=”1/3″][vc_single_image image=”1396″ img_size=”full” onclick=”custom_link” link=”http://goodworks.eastsons.com/donation/”][/vc_column][/vc_row][vc_row 0=””][vc_column][vc_column_text 0=””]

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खूबसूरती पर हक़ है हमारा

खूबसूरती पर हक़ है हमारा

[vc_row 0=””][vc_column width=”2/3″][vc_column_text 0=””]ये बाजारवाद का फूंका गया भ्रमित विगुल है आज कई दिनों से इस पर लिखना चाहती थी… एक और ऐड आता टीवी पर जिसमें बच्चे के सुनहरे भविष्य के लिए बेहतरीन कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने की हिमायत होती है…

दोनों ऐड मेरे मन में घूम ही रहा था कि मेरे पड़ोस में एक बच्ची आयी थी जो दिल्ली के बहुत जानेमाने कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ती है ..मैं आँगन में बैठी उसे झूला झूलते हुए देख रही थी और उसका गाना भी सुन रही थी

…गौरतलब है कि वो पिछले साल भी जिद करके मुझसे आँगन झूला डलवाई थी ..एक पुराना से झूला पड़ा रहता है जो कभी बिट्टी के लिए आया था… ये क़रीब 7 ,8 साल की बच्ची अब उसपर अपना अधिकार समझती है।

अब मैं विषय पर आती हूँ वही आँगन में कुछ एलोवेरा के पौधे लगे हैं ,एकाएक उसकी निगाह उन पौधों पर पड़ती है झूले से उतरकर दौड़कर एलोवेरा तोड़ती है और छीलकर मुँह पर ख़ूब रगड़ रही है…

मेरे पास आकर कहती है इसे लगाने से लोग गोरे हो जाते हैं ना!
मुझे थोड़ी सी हँसी आयी मैंने कहा खाया भी जाता है खाने से दिमाग तेज होता है .! और तुम तो खुद ही गोरी हो !

बच्ची बोली नहीं मुझे पता है मम्मी ने बताया मम्मी लगाती हैं मुझे भी लगाने को कहती हैं ..मैं खाऊँगी नहीं बस लगाऊंगी ..इसे लगाने से सुंदर हो जाऊँगी ..मैंने फिर हँसकर पूछा सुंदर होने से क्या होगा? उसने कहा फिर सुंदर सा दूल्हा मिलेगा …हँसी के साथ मुझे अचरज भी हुआ …

पर अभी मत चौकिये ! आगे सुनिये !,मैं उसे कुछ समझाने के मूड में आ गयी ..मैंने कहा इसका रस पीने से याददाश्त बढ़ती है ख़ूब पढ़कर कुछ बनना है कि सिर्फ़ सुंदर बनना … ख़ूब सोचकर बताओ ! अबकी उसके जबाब पर मैं अवाक रह गयी उसने कहा ! नहीं मुझे सुंदर ही बनना है !

..,मन में कहा कि सत्यानाश हो इस बाजारवाद का ! अबोध बाल मन को भी ग्लैमर ने जकड़ रखा है …मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि इसे कैसे समझाऊँ ..ख़ूब पैसा कमाने वाले बाप की बेटी है जिसे महंगे कॉन्वेंट स्कूल में 3 साल से भेजा जा रहा है औसत बुद्धि के माँ बाप से तो कोई आशा नहीं वो तो छोटी सी बच्ची के स्कूल के नियमों , टेस्ट एक्जाम को ऐसे बताते हैं जैसे आईएस की परीक्षा और इंटरव्यू हो … पर ये कॉन्वेंट ..??

अचरज़ तब और भी हुआ जब मेरे यहाँ खेतों में काम करने वाली काकी की नातिन जो प्राइमरी स्कूल में पढ़ती है और ज्यादातर मेरे घर में रहती है कुछ पढ़ाई लिखाई के साथ यही खेलती रहती है मैंने उससे भी पूछा तुम्हें भी कुछ बनना है या इसकी तरह सुंदर ही बनना है ..उसने ज्यादा दुनिया नहीं देखी उसकी नजर में मेरे जैसा जीवन ही सबसे बड़ी उपलब्धि है उसने बहुत सोचकर कहा भाभी आप जैसा बनना है ..

मैंने समझाया .. कि मुझे छोड़ो ….देखो लड़कियां डॉक्टर इंजीनियर पुलिस टीचर बन रही हैं तब उसने लड़कियों का सबसे चहेता प्रोफेशन डॉक्टर कहा ..मुझे डर लगा कहीं ये भोजपुरी हीरोइन बनने की बात न कह दे क्योंकि कभी खुश होकर बाप के फोन में सुने वही गाने गाती है ।

लेकिन मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि एक ही उम्र की दो बच्चियां जिसमें एक हाईप्रोफाइल जीवन जी रही है दूसरी गरीब है परिवार दूसरों के यहाँ मजदूरी करता है …पर दोनों में तो ज्यादा अंतर नहीं है बल्कि गरीब बच्ची ही बेहतर सोच रखती है

आखिर ये जहर कहाँ से घुल रहा है बच्चियों में क्या सिर्फ सुंदरता पर हक है हमारा…. कहने वाली दीपिका पादुकोण का आतमुग्धता से भरे दर्शन से महिला सशक्तिकरण आएगा …क्यों नहीं हम बच्चियों को इस जहर से बचाते ….छोटी सी उम्र में सजने लगती हैं हम देखकर मुस्कुराते हैं उसे पक्का हो जाता है कि सुंदर दिखना ही जिंदगी की सबसे बड़ी प्राथमिकता है …और वो बचपन से शुरू हुआ खेल जीवन भर चलता है …

आप कहेंगे पहले भी महिलायें सजती थी ..सजती थी पर इतना समय और पैसा ,ऊर्जा नहीं बर्बाद करती थी …

मैं एक शादी में गयी थी एक दशवीं में पढ़ने वाली लड़की करीब चार घंटे मेरे सामने ही सजती रही …सज सज कर कार्टून बन गयी माँ आकर कह रही हैं नजर न लग जाये मेरी बेटी को …मुझे भी थोड़ी तारीफ करनी पड़ी …लडक़ी बोली दी ! मेरे पास मेकअप का पूरा समान नहीं है नहीं तो आप देखती …मन में आया कि सही में झोले भर से क्या होता है …बोरा भर मैकअप का सामान तो होना ही चाहिए।

आखिर हम जा कहाँ रहे हैं … हम स्त्री स्वतंत्रता की बात किस मुँह से करते हैं इसतरह तो एक मानसिक गुलामी में जकड़ी जा रही हैं … बहुत पहले टीवी पर सबना आज़मी की अर्थ फ़िल्म देखी थी तो समझ में आया कि जीवन की सार्थकता सिर्फ पत्नी और प्रेयसी बनने में नहीं है , ध्यान से अपने आसपास देखे तो जीने के कई विजन हैं बस उसके लिए हिम्मत और लगन चाहिए ।

मैंने बहुत पहले नेल्सन मंडेला की आत्मकथा पढ़ी थी जिसमें उन्होंने बताया कि ! अगर हम पूर्वाग्रहों और संक्रिर्ण सोच के सीखचों के पीछे बंदी हैं तो सच्चे अर्थों में कभी भी आजाद नहीं है।

बच्चियों को बताया जाये कि मॉडल और एक्ट्रेसेस की नकल जीवन नहीं है उनका ग्लैमर उनकी जीविका है । सुंदर दिखना और किसी पुरुष को रिझाना में ही जीवन की सार्थकता नहीं है । उनके सामने हमेशा कल्पना चावला और इंदिरा गांधी ,सरोजनी नायडू आदि को आदर्श रखा जाये न कि प्रियंका चोपड़ा सोनम कपूर या करीना को ।

याद रखिये हम सदियों शोषित और वंचित रहे हैं उसका कारण था हमारी पराधीनता और कोमलता ,क्यों हम अपनी बच्चियों को भी इसी नर्क में घसीट रहे हैं …सुंदर दिखना गलती नहीं है गलती है उसके लिए जीवन के अमूल्य पलों और अपनी ढ़ेर सारी ऊर्जा को बस उसी में झोंक देना…

ख़ूब सजो सँवरो पर ध्यान रखो कि उसके पीछे जीवन का स्वर्णिम पल और सुनहरा भविष्य छूट न जाये । और वो मनोरोग न बनने पाये ।

Rupam Mishra

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GIVE YOUR SHARE TO SHOW YOU CARE

GIVE YOUR SHARE TO SHOW YOU CARE

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To work for Society is not an individual’s responsibility.
Rather, it’s collective.
Thinking of doing something for needy is good
And putting that thought into action is even better.
It’s great that you are loving & caring.
But of what use, if you don’t express your love & care.
There are many, who are desperately seeking your affection.
So, please come ahead & give your share to show you care.
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जरूरतों  का  बोझ

जरूरतों का बोझ

[vc_row 0=””][vc_column 0=”css=“.vc_custom_1517567823880″ width=”2/3″][vc_column_text 0=””]मैले कुचैले धोती कुर्ते में एक बूढ़ा आदमी लकड़ियों और आटे दाल से लदी साइकिल को ले के सड़क के बीचों बीच खड़ा हो गया I वक्त था शाम का, सभी का अपने काम से लौटने का वक्त . उस बुजुर्ग का अचानक से बीच राह खड़े हो जाना आने जाने वाले राहगीरों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था I पर विडंबना यह है कि उस आकर्षण का कारण बुजुर्ग का उपहास का केंद्र बनना था ना कि बुजुर्ग के प्रति मानवीय संवेदना का होना I घोर आश्चर्य का विषय है कि कैसे लोगों को उस उपहासात्मक कृत्य के पीछे की वजह नहीं दिखी , किसी को उस बुजुर्ग की अवस्था नहीं नजर आई, किसी ने ये सोचने की जहमत नहीं उठाई कि क्या उम्र के उस पड़ाव तक पहुँचने पर खुद उनमे इतनी ताकत होगी कि वो अपने परिवार की जरूरतों का बोझ उठा सकें , क्या किसी को उस इंसान के आत्म सम्मान को ठेस पहुँचाते हुए थोड़ी भी शर्म नहीं आई , क्या पसीने से तर बतर उस बुजुर्ग का चेहरा कोई ना पढ़ पाया जिससे यह साफ़ झलक रहा था कि वह थक के चूर हो चुका है , उसमें साइकिल को आगे खींचने की बिल्कुल भी ताकत नहीं बची है I

चिंतन का विषय यह है कि आखिर हम किस आधुनिकता की होड़ में लगे हुए हैं , आने वाली पीढ़ी को हम क्या शिक्षा दे रहे हैं, क्या मानवीय गुणों की बलि चढ़ा कर ही हम आधुनिक बन पाएंगे I क्या हम अपने अंदर दया भावना को जागृत रखते हुए आगे नहीं बढ़ सकते , क्या हमारे शिक्षित होने का पैमाना हमारा व्यवहार नहीं .
जरुरत है इस बारे में पहल करने की. खुद के सामने या खुद के संज्ञान में घटित होने वाले किसी भी अनुचित घटना के प्रति मूकदर्शक बने रहना मनुष्य होने का सूचक नहीं I यदि हम अपनी संवेदनाओं को जीवित रखने के इस विचार को अपना लें तो निश्चय ही हमारी आने वाली पीढ़ी अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बनाएगी क्योंकि बच्चे वो नहीं सीखते जो हम उन्हें सिखाते हैं , बच्चे तो वो सीखते हैं जो वो हमें करता हुआ देखते हैं I

[/vc_column_text][/vc_column][vc_column width=”1/3″ css=”.vc_custom_1517568205549{padding-top: 20px !important;}”][vc_single_image image=”1396″ img_size=”full” onclick=”custom_link” link=”http://goodworks.eastsons.com/donation/” css=”.vc_custom_1559213337391{margin-top: -20px !important;}”][/vc_column][/vc_row][vc_row 0=””][vc_column][vc_column_text 0=””]

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Even 4 Slices of Bread can teach you a life lesson

Even 4 Slices of Bread can teach you a life lesson

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[/vc_column_text][/vc_column][/vc_row][vc_row 0=””][vc_column 0=”css=“.vc_custom_1517567823880″ width=”2/3″][vc_column_text 0=””]7 year old little Mehak with sweet innocent smile, entered the GoodWorks Center chirping like a bird and her open shampooed hair waved like the wings of a bird that day. She seemed to be happier than the other days. That day, she even talked to me in her hard to hear lovely voice complaining about one of her friends. I was just amazingly looking at her and dived into the sea of thoughts that, any child, if nurtured in its specifically required way, can do wonders. Within a few days, Mehak had started transforming from a quiet and shy girl to an active and bubbly girl. Soon, a murmuring fell into my ears and I was out of my thoughts. Mehak was standing right in front of me with a tiffin box in her hand. She was offering me Bread with cream & sugar applied on it. On asking, was there anything special, her reply left me with no other option than to dive again into the sea of thoughts. She said it was her Birthday treat which her mother had prepared to be distributed among her friends & teachers. I was overwhelmed.

That day, Mehak taught me a life lesson that It is not important, how much we have, how we use what we have, is more important.

[/vc_column_text][/vc_column][vc_column width=”1/3″][vc_video link=”https://www.youtube.com/watch?v=SDFwY3EYtEQ” el_class=”vheight”][/vc_column][/vc_row][vc_row 0=””][vc_column][vc_column_text 0=””]

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Children must get the opportunity to feel  –  “ There is someone somewhere, who cares ”

Children must get the opportunity to feel – “ There is someone somewhere, who cares ”

[vc_row][vc_column width=”2/3″ css=”.vc_custom_1517567823880][vc_column_text]Having this feeling enables a child enjoy his childhood & flourish well as this ensures emotional well-being of a child. An emotionally strong child will undoubtedly perform better than emotionally weak child. Parents of these children strive hard to feed them and provide them clothing. In this struggle, they fail in the management of providing emotional support to them. A shoulder to cry upon when they feel like, an assurance of doing well despite feeling lack of confidence. When such a child gets these things, he sees a ray of hope, he starts feeling motivated and puts his efforts in order to come out of the despair of darkness. And ofcourse one’s efficiency increases if backed up by moral support in the form of appreciation. One’s happiness also increases when someone is there to share with.

With the aim of providing such intangible support but still very important , to these little buds, EastSons GoodWorks is highly committed so that these also blossom well, no matter if born in a thorny garden.

GoodWorks

[/vc_column_text][/vc_column][vc_column width=”1/3″ css=”.vc_custom_1517568205549{padding-top: 20px !important;}”][vc_video link=”https://www.youtube.com/watch?v=SDFwY3EYtEQ” el_class=”vheight”][/vc_column][/vc_row]